Monday, July 18, 2011

F commerce - It's not just about Bulls and Bears.

The following Infographic designed by Sonia Malpaso from SMI gives a brief history about Social Commerce on Facebook. 

source: Social Media Influence

Wednesday, July 13, 2011

Muraqaba

The following poem came as a comment on my previous post, from one of my dearest friends and mentor. He says that the poem was written in an abosolute spontaneity and the words flew as if some external force pumped the thoughts and compelled him to type them down. Here it goes. 
ps: i have altered it a bit (very few changes)


गर कोई बता  दे,
तो  भी क्या फरक  पड़ता  है?
ज़िन्दगी  हुई  पूरी 
तो मौत लिए  जाता  है ?
ज़िन्दगी  की  तलाश  में  ज़िन्दगी  अधूरी  रह  जाती  है 
ज़िन्दगी  गर  मिलती  है  तो  जान  लिए  जाती  है 
पहचान  के  उस  ज़िन्दगी  को  जो  सवाल  उठाये  जाता  है 
क्या  है  जान ? खुदी क्या है ?
क्या  है  प्यार ? रूहान  क्या  है ?
क्या  तू  भी  इसी  तलाश  में  डूबा  जाता  है ?
कौन  है  तू ? तेरी  पहचान  क्या  है ?
गर  पूरी  हो तलाश तो 
तो क्या इक अँधेरी रात में भटकता जुगनू है तू? 
तू  किसको  ढूँढता  फिर  ता है ?
न  तू  रहेगा, न  तेरा  वजूद  बाक़ी 
लगे  रहो  सिर्र - ओ - इसरार  की  तलाश  में 
कौन  जाने  किसको, कब, क्या, कैसे  मिल  जाए
किसी  को  शायद  रूह
तो  किसी  को   नूर या फिर कोई अपने नफ्स पे काबू और मिल जाए.................

Friday, July 1, 2011

Gardish-e-waqt sataaley | Mai abhi zinda hoon

An excerpt from the song Meri Kahaani by Strings. One of my personal favourites. Thought of sharing these lines today.

Yeh hai meri kahaani by mscube

बजाए प्यार कि शबनम मेरे गुलिस्तान में 
बरसते रहते हैं हर सिम्त मौत के साए
सियाहियों से उलझ पड़ती हैं मेरी आँखें
कोई नहीं, कोई भी नहीं जो बतलाए
कितनि देर मैं उजालों कि राह देखता रहा
कोई नहीं, है कोई भी नहीं 
न पास न दूर 

एक यार है, 
दिल कि धड़कन 
अपनी चाहत का जोह एलान किए जाती है 
ज़िन्दगी है जो जियेह जाती है
खून के घूँट पिए जाती है
ख्वाब आँखों से सिए जाती है 
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